ज़िन्दगी की तारीख़ में, अपने समय की कीमत, क्या आंकते हो । जिम्मेदारियों के बहाने, क्या, हर रोज़, खुदको सुनाते हो । नाकामयाबी से डरते हो, इस सच को, क्यों झुठलाते हो । अपने नादान ख्वाबों को, जीवित रखने कि कोशिश, हर रोज़ करते हो । केवल सोने की मोहर ही, सफलता का एक, न पैमाना हो । आंखों की चमक, हसी की धनक, उम्मीद की खनक, इनका मोल, अनमोल हो । न हो झिझक, अंजान भविष्य की । हो बस मिठास, हर कण में, अपने परिश्रम की ।